Introduction
फ़ातिमा मुल्क की सबसे मशहूर इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी की मालिक थी। ज़ावयार से इस की मुलाक़ात एक बिज़नस मीटिंग में हुई थी। लेकिन फ़ातिमा तो उसे दो साल पहले से ही दिल दिए बैठी थी। कम उमर की पहली मुहब्बत की कहानी, जिसमें लड़की इशक़ की आग में जल कर कुन्दन होती है। एक स्वीट और क्यूट सी लव स्टोरी।
लागी तुम से मॅन की लगन
मुहब्बत ज़ात होती है
मुहब्बत ज़ात की तकमील होती है
कोई जंगल में जा ठहरे
किसी बस्ती में बस जाए
मुहब्बत साथ होती है
मुहब्बत ज़ात होती है
मुहब्बत ख़ुशबू की लय
मुहब्बत मौसमों की धुन
मुहब्बत आबशारों के
निखरते पानियों का मन
मुहब्बत जंगलों में
रक़्स करती मोरनी का तन
मुहब्बत सर्दियों में
धूप बनती है
मुहब्बत चिलचिलाते
गर्म सहराओं में
ठंडी छांव की मानिंद
मुहब्बत अजनबी दुनिया में
अपने गांव की मानिंद
मुहब्बत दिल
मुहब्बत जां
मुहब्बत रूह का दरमां
मुहब्बत मूर्ति है
और कभी जो दिल के
मन्दिर में कहीं पर
टूट जाए तो
मुहब्बत कांच की गुड़िया
फ़िज़ाऔं में किसी के हाथ
से गर छूट जाए तो
मुहब्बत आबला है कर्ब का
और फूट जाए तो
मुहब्बत रोग होती है
मुहब्बत सोज़ होती है
मुहब्बत सोग होती है
मुहब्बत शाम होती है
मुहब्बत रात होती है
मुहब्बत झिलमिलाती आंख में
बरसात होती है
मुहब्बत नींद की रुत में
सुलगते जान को आते
रतजगों की घात होती है
मुहब्बत जीत होती है
मुहब्बत मात होती है
मुहब्बत ज़ात होती है
Page Break
हिस्सा १
मैं मीटिंग रुम में दाख़िल हुआ तो वो अपने वालिद की कुर्सी में बैठी हुई थी। मिस्टर क़ासिम उस से सामने यके बाद दीगरे डाकूमैंटस रखते जा रहे थे। और वो बिना पढ़े, बिना सोचे समझे अंधा धुंद सारे डाकूमैंटस पर दस्तख़त किए जा रही थी।
“हम इसी तरह आसानी से काग़ज़ात पर दस्तख़त करवा कर उस के पापा के कारोबार को हमारे नाम ट्रान्सफर करवा सकते हैं ।”
मैं ने अली के कान में सरगोशी की और वो अपनी मुस्कुराहट को छिपाने की कोशिश करने लगा। दस मिनट के बाद, तमाम दस्तावेज़ात पर दस्तख़त कर लिए गए थे। उस ने मिस्टर क़ासिम को नज़र उठा कर देखा।
“बस इतना ही था ना? क्या में अब घर जा सकती हूँ?“
उस के चेहरा पर चिड़चिड़ाहट का तास्सुर था। मुझे याद आया कि पिछली बार की मुलाक़ात में भी उस का यही मूड था। पहले की बनिसबत थोड़ी दुबली लग रही थी, लेकिन अब भी सेहत मंद सी थी। मेरी अम्मी के अलफ़ाज़ में कहें तो अब भी उस का थोड़ा बेबी फॅट बाक़ी था। नाज़ुक-मिज़ाजी अब भी उतनी ही थी कि वो डाकूमैंटस पर साइन कर के ही थक गई थी।
“आज दिन-भर बहुत सी मीटिंगज़ हैं। अगर आप अटेंड करेंगी तो बेहतर होगा। इस से आप को बिज़निस समझने में मदद मिलेगी।“
मैं ने मुदाख़िलत की और उस ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। और जब वो बोली तो उस का लहजा नरम था।
“ओह… आप…“
उस ने मुझे याद रखा था। मुझे उस की तवक़्क़ो नहीं थी। और खास तौर पर जिस तरह हमारी पिछली मुलाक़ात का तजुर्बा था, उस का याद ना रखना ही बेहतर होता।
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मैं उस से पहली बार एक बिज़निस पार्टी में मिला था। बिज़निस पार्टीज़ मुझे पसंद नहीं , लेकिन मैं मेज़बानों की टीम का एक हिस्सा था इस लिए पार्टी में ना आने का ऑपशन ना था। पार्टी ZMobile के मालिक और मास्टरमाइंड , मेरे बॉस , मिस्टर ज़िया की तरफ़ से दी गई थी। मैन्युफैक्चरिंग के जनरल मैनेजर होने के हैसियत से, मेरा वहां मौजूद होना ज़रूरी था। मिस्टर ज़िया इंडस्ट्री के कुछ मशहूर लोगों के एक ग्रुप के साथ मसरूफ़ थे और में अपने साथी दारों के साथ मिल रहा था।
ईमानदारी की बात कहूं तो मैं बिज़निस पार्टीयों को मेल-मुलाक़ात करने और कांटेक्ट बढ़ाने का मौक़ा नहीं समझता था। हम तीन, अली, मैं और अब्बास निसबतन ख़ामोश कोने में बात कर रहे थे। हम अपने बी.बी.ए बीच में टाप फाईव में से तीन थे। अली और मैं ने दो साल पहले ZMobile ज्वाइन किया था। अली मार्केटिंग में था। और अब्बास एक स्टील फ़र्म के साथ था। ये कारोबारी मुलाक़ातें हमें मिल बैठने का मौक़ा देती थीं। बड़े बड़े लोगों से मिलने और राबते बढ़ाने की बजाय, हम अपना छोटा ग्रुप बनाकर बातचीत करना पसंद करते थे। हम अपने मौजूदा पोज़ीशन और मुस्तक़बिल की मंसूबा बंदी के बारे में बातचीत कर रहे थे। मैं मिस्टर ज़िया की तरफ़ भी नज़र रखे हुए था। अगर उन्हें मेरी ज़रूरत होती तो, में एक लम्हे में उन की ख़िदमत में हाज़िर हो जाता।
अचानक मैं ने एक नौजवान लड़की को मिस्टर ज़िया की तरफ़ आते हुए देखा। वो घुटनों पर से फटी हुई जीन्ज़ और ढीली सी ब्लेक शर्ट पहने हुए थी। माज़रत को ग़ैर ज़रूरी जानते हुए गुफ़्तगु में मुदाख़िलत की।
“डैडी, मैं बोर हो रही हूँ। मैं घर जाना चाहती हूँ।”
अली ने मेरी नज़रों का पीछा किया , मेरी नागाहों के मर्कज़ को जान कर उस ने मुझे बताना ज़रूरी समझा। “ये बॉस की इकलौती बेटी, फ़ातिमा ज़िया है।”
मैं ने ग़ौर से उस का जायज़ा लिया। बॉस की बेटी फ़ातिमा ज़िया लोगों में ख़तरनाक हद तक बिगड़ी हुई लड़की के हवाले से जानी जाती थी। देखने में , वो एक सीधी-सादी, बेज़रर और पुरसुकून नौजवान ख़ातून की तरह लगती थी। उस का रंग गोरा था। उस के गहरी ब्राउन बाल ऊंची पूनी टेल में बंधे हुए थे। एक दम सुथराई से। एक भी बाल इधर उधर नहीं था। इस बात ने मुझे काफ़ी हैरान किया, क्योंकि लड़कियों में ताज़ा-तरीन रुझान ये था कि बाल चेहरे पर आएं और वो उसे बार बार अपने चेहरे से बाल झटकें। मेरा अंदाज़ा था कि उस का क़द पाँच फुट चार इंच का रहा होगा। उस की शख़्सियत ख़ुशगवार ख़ुश-मिज़ाज सी थी। अगर वो थोड़ा सा वज़न कम कर लेती और अपना ड्रेसिंग सेंस सुधार लेती तो मेरी नज़र में ख़ूबसूरत भी क़रार दी जा सकती थी। मुझे नई नसल के फटी जीन्ज़ वाले फ़ैशन से सख़्त नफ़रत थी। मुझे मौक़ा के लिहाज़ से ड्रैस–अप होना पसंद था। और ज़ाहिरी बात थी कि फ़ातिमा ज़िया का स्टाइल कुछ और था।
“स्वीट हार्ट, पार्टी अभी शुरू हुई है और मेहमान अभी भी आ रहे हैं। मैं अभी नहीं चल सकता। आप देखें, कोई फ्रेंड होगा, कुछ आप की उम्र के लोग भी शामिल हैं इस पार्टी में।“
मिस्टर ज़िया ने मुहब्बत से कहा। उन के मेहमान फ़ातिमा को दिलचस्पी से देख रहे थे। बिना झिझक अगली फ़र्माइश की थी।
“मैं जानती हूँ। किसी से कहें कि मुझे छोड़ दे।”
“ड्राईवर यहां नहीं है। वो किसी को पिक करने के लिए गया हुआ है।”
“ये मेरा मसला नहीं है, डैड।”
वो मुसिर था। अब्बास के बॉस मिस्टर ताहिर भी वहीं थे। उन्हों ने ऑफ़र की। “मैं अपने ड्राईवर को कह देता हूँ। आप जहां भी जाना चाहती हैं, आप को छोड़ देगा।”
“मैं आप के ड्राईवर के साथ नहीं जा रही ।”
उस ने सफाचट इनकार कर दिया। मिस्टर ताहिर एक झीनपी हंसी के साथ चुप हो गए। वो वाक़ई बिगड़ी हुई थी। उन्हें मज़ीद शर्मिंदगी से बचाने का वक़्त था। मेरी मुदाख़िलत की बारी थी।
“मैं जाता हूँ। हमारे बॉस दोनों ही परेशान हैं।” मैं ने अपने दोस्तों को कहा और मिस्टर ज़िया की तरफ़ बढ़ा।
“अममम। माफ़ कीजिये सर। अगर आप को कोई एतराज़ नहीं है तो मैं इन्हें ड्राप कर सकता हूँ। अली भी अपनी गाड़ी लाया है।”
मैं ने पेशकश की। मिस्टर ताहिर मुझ देखकर मुस्कुराए।
“हेलो, ज़ावयार। तवील अर्से बाद मिले हो।“
मैं ने मुसाफ़हे के लिए अपना बाज़ू बढ़ाया। “हेलो सर । आप कैसे हैं? “
मास्टर्ज़ ख़त्म करने के बाद, ताहिर साहिब मुझे अपनी फ़र्म में शामिल करना चाह रहे थे। लेकिन मुझे इलेक्ट्रॉनिक्स के बिज़निस में ज़्यादा दिलचस्पी थी। वो कभी कभी इस के बारे में मुझे छेड़ते रहते थे। वो दोस्ताना और हमदरद टाइप के थे। इसी हमदर्दी और अच्छी फ़ित्रत के चलते उन्हों ने फ़ातिमा को छोड़ने की पेशकश की और उस ने साफ़ मना भी कर दिया। मैं मिस्टर ज़िया की तरफ़ मुड़ा। वो मेरी पेशकश पर रीलैक्स से लगे… और उन की बेटी… वह बहुत देर तक मुझे घूरती रही। पता नहीं पहचानने की कोशिश कर रही थी या कोई और बात थी। और फिर बोली तो लगा कि ख़ामोश ही ठीक थी।
“आप को पहली बार देख रही हूँ। शायद यहां नए हैं। बॉस की नज़रों में प्वाईंटस हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। है ना?“ वो मुझ से बोली। “मैं आप को एक आसान रास्ता बताती हूँ। अगर आप मेरे वालिद को मुतास्सिर करना चाहते हैं तो मुझे इम्प्रेस करें।” वो भवें उचका कर बोली थी।
ग्रेट। मैं दूसरों को एक शर्मनाक सूरत-ए-हाल से बचाने की कोशिश कर रहा था, और अब मैं ख़ुद ही शर्मिंदा सा खड़ा था। लेकिन मैं इतनी आसानी से बर्दाश्त करने वालों में से ना था और ना ही मुझे उस से कोई पिदराना शफ़क़त महसूस हो रही थी कि में उस का लिहाज़ करता। मैं ने उसी की तरह रूड लहजे में जवाब दिया। “क्या मतलब है इस बात का?”
“वही करने को कह रही हूँ … जो ज़्यादा-तर लोग इन दिनों करते हैं। बाप को पटाने के लिए बेटी पर डोरे डालो।” उस ने बेनियाज़ी से अपने कंधों को अचका कर जवाब दिया।
मेरे तन-बदन में इस इलज़ाम पर आग सी लग गई। और यह किस तरह की भाषा बोल रही थी। मैं ने अपने दिमाग़ को ठंडा करने की कोशिश की लेकिन इस से पहले कि मैं ख़ुद कुछ समझ पाता, में बोलना शुरू हो चुका था। “में अपने बॉस और मिस्टर ताहिर को इस शर्मिंदगी से बचाना चाह रहा था, जो आप जैसी बदतमीज़ लड़की की वजह से उन्हें हो रही है। मगर आप नहीं समझेंगी। शायद आप को लोग बहुत अलग तरीक़े से ट्रीट करते हों कि आप इतने बड़े बिज़निस कीहोने वाली मालिक हैं। लेकिन हर एक को एक तरह का समझ लेना तो ठीक नहीं। और ना ही ये लोगों से बात करने का तरीक़ा है। ख़ुसूसन उस शख़्स से जो आप से पहली बार मिल रहा हो, और जो आप को मदद की ऑफ़र भी कर रहा हो। मुझे अपने फ़ैसला पर अफ़सोस है। मैं अपनी पेशकश को वापिस ले लेता हूँ। मैं चाहूँगा कि आप पार्टी में रुकीं और मर जाने की हद तक बोर होजाएं। मुझे इस से किया? मुझे मुदाख़िलत की क्या ज़रूरत थी? “
मैं ने कभी ऊंची आवाज़ से बात नहीं की। अब भी मेरा लहजा धीमा था। लेकिन मुझे मालूम था कि मेरे अलफ़ाज़ सख़्त थे। उस की अनखों में आँसू भर आए। मैं जाने के लिए पल्टा।
“बिहेव योर सेल्फ फ़ातिमा! ज़ावयार आप को छोड़ देंगे। आप उन के साथ जा सकती हैं।“
मिस्टर ज़िया ने टोका। मेरी हैरत की हद ना रही जब वो ख़ामोशी से मान गई। धत तेरे की।
“ठीक है। अपनी गाड़ी ले आएं।” उस ने मुझे कहा।
“प्लीज़ बाहर इंतिज़ार करें।” कह कर में अपने दोस्तों की तरफ़ बढ़ गया।
अली और अब्बास दूर से दिलचस्पी से ये सब देख रहे थे। शायद उन्हों ने कुछ सुना ना हो, लेकिन ज़रूर किसी टेंशन का एहसास तो हुआ होगा। मैं ने मुस्कराकर सब ठीक होने का इशारा दिया।
“हमें जाना होगा, दोस्त। शहज़ादी साहिबा को घर जाने के लिए सवारी की ज़रूरत है। अब्बास हम बाद में मिलते हैं यार।”
अब्बास ने समझ कर सर हिला दिया। हम ने हाथ मिलाया और अली और मैं पार्किंग की तरफ़ बढ़े। अली ने अपनी जैकेट की जेब से चाबियाँ निकालीं । और मैं ने उस के कुछ समझने से पहले उस के हाथ से चाबियाँ छीन ली थीं।
“मैं ड्राईव करने लगा हूँ और तुम उसे एंटरटेन करो।”
“कौन सी बड़ी बात है?” अली को हैरानी हुई।
“बड़ी बात ये है कि तुम ने ही मुझे बताया था कि लोग उसे बिगड़ी हुई शहज़ादी कहते हैं। अगर ये काफ़ी नहीं था तो, मैं ने अभी अभी बज़ात-ए-ख़ुद इस बात का तजुर्बा किया है। चंद मिनट पहले मेरी उस के साथ तक़रीबन लड़ाई हो चुकी है। क्या तुम ने नहीं देखा? मैं उस से दोस्ताना रवैय्या नहीं रख सकता। तुम्हारा ऐसा कोई मसला नहीं है, पहली बार मिलोगे। तुम उस से बात कर सकते हो।”
अली नर्वस हो गया। अगर किसी शख़्स से बात करने में आप की इन्सलट होने का पूरा पूरा मौक़ा मौजूद होतो ऐसे शख़्स से कौन बात करना चाहेगा? मैं ने गाड़ी को इन लॉक किया और ड्राईवर की नशिस्त बैठ गया। अली दूसरी तरफ़ से आकर बैठा और उम्मीद से लबरेज़ आवाज़ में कहा। “शायद हमें बात करने की ज़रूरत नहीं होगी। वो शायद अपने आई फ़ोन के साथ मसरूफ़ रहेंगी।“
“तुम्हें कैसे पता कि उस के पास आई फ़ोन है?”
“बस अंदाज़ा लगाया है।”
“हमें बस बेहतर की उम्मीद करनी चाहिए।“
मैं ने उसे आस दिलाई। मैं ने गाड़ी को रीवरस किया और हाल के सामने वाले गेट की तरफ़ निकला। वो वहां बेचैनी से इंतिज़ार कर रही थी। अली ने शीशे को नीचे किया और उसे इशारा किया। उस ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और धम से पीछे की सेट पर बैठी। बैठी क्या थी, गोया ख़ुद को फेंका था। गाड़ी थोड़ा दब सी गई। उस के ज़्यादा वज़न की बात ना थी। मुझे लगा कि उस ने अपना ग़ुस्सा पूरा गाड़ी पर निकालने की कोशिश की थी। मैं ने एक्सीलेटर दबाया और चंद मिनट ख़ामोशी से गुज़र गए। अली ने ख़ामोशी को तोड़ा।
“मैं अली हूँ। मैं आप के वालिद के साथ काम करता हूँ।“
“फ़ातिमा ज़िया।“
मग़रूर से अंदाज़ में दो अलफ़ाज़ कह कर वो अपने फ़ोन की तरफ़ मुतवज्जा हो गई। अली और मैं ने एक दूसरे की तरफ़ देखा और मुस्कुरा दिए। हमारा अंदाज़ा सही था। वो अपने फ़ोन में मगन थी। हमें फ़िक्र करने की ज़रूरत ना थी। लेकिन अगले ही लम्हे हमारी सोच ग़लत साबित हुई।
“मुझे लगता है मैं आप लोगों को जानती हूँ। क्या आप चंद महीने पहले दिल्ली यूनीवर्सिटी आए थे?“
मैं ने आईने में उस के अक्स पर एक नज़र डाली, अली को एक नज़र देखा और चुप-चाप गाड़ी चलाता रहा।
अली ने पूछा “क्या आप दिल्ली यूनीवर्सिटी से पढ़ रही हैं?”
“जी हाँ। सवाल नज़र अंदाज़ मत करें। क्या आप पिछले विंटर सैशन के दौरान योनी आए थे?“
“हाँ, हम वहां गए तो थे। वाय डू यू आस्क?“
अली ने इस सवाल को ख़ालिस ब्रिटिश लब-ओ-लहजा में कहने की ख़ासी प्रैक्टिस की थी, यूँही , तफ़रीह के लिए। और इस वक़्त भी वो अनजाने में उसी लहजा में बोल गया था, जो मुझे काफ़ी मज़हका–ख़ेज़ लगा। मैं ख़ुद में मुस्कुरा दिया। मैं इस सूरत-ए-हाल से भरपूर लुतफ़ अंदोज़ हो रहा था। फ़ातिमा सवालों के हमले कर रही थी। अली पर जवाब देने की ज़िम्मेदारी थी। और मैं ख़ुशी से बिना किसी मुदाख़िलत के ड्राईवर की ज़िम्मेदारी निभा रहा था।
“मैं ने आप लोगों को वहां देखा था। शायद आप किसी से मुलाक़ात कर रहे थे। मुझे ज़ावयार बहुत पसंद आए थे। बहुत हैंडसम और अट्रैक्ट पर्सनालिटी है!“
“हां। मैं देख रहा हूँ कि ज़ावयार ने आप को काफ़ी इम्प्रेस किया है। आप को उस के बारे में बहुत अच्छी तरह याद है। क्या आप ने किसी और को भी देखा था या नोटिस किया था?” अली काफ़ी बातूनी था और अब तो उसे भरपूर मौक़ा मिला था।
“यक़ीनन। वहां आप भी थे। अगर मेरी याददाश्त ठीक काम कर रही है तो उस वक़्त आप अपने बालों को अलग तरीक़े से सेट करते थे। ये कॉरपोरेट लुक, कॉलेज से ताज़ा निकले हुए लक से बहुत मुख़्तलिफ़ है। आप लोगों की पर्सनालिटी में बहुत वाज़िह फ़र्क़ है। अब आप काफ़ी मुख़्तलिफ़ नज़र आते हैं।“
“आप की याददाश्त बहुत शानदार है, मिस फ़ातिमा।” अली ने कहा। मैं मुत्तफ़िक़ था। हम कुछ माह क़बल कुछ दोस्तों से मिलने के लिए दिल्ली यूनीवर्सिटी गए थे। और उस ने पता नहीं किस कोने से देखकर हमें इतनी तफ़सील से याद रखा था।
“जब आप ने हम दोनों को इतनी अच्छी तरह से याद रखा है तो पार्टी में ड्रामा करने की ज़रूरत नहीं थी।“ मैं ने जल कर कहा।
“आप का क्या मसला है, ज़ावयार? क्या आप एंग्री यंग मैन की इमेज रखना पसंद करते हैं? ” वो मुझ से मुख़ातब हुई।
“ये अजनबियों से गुफ़्तगु करने का कोई तरीक़ा नहीं है,” मैं ने दाँत पीस कर कहा। बदतमीज़ लड़की।
“मेरे दादा ना बनें।” उस ने मेरी बात को हवा में उड़ा दिया।
“हाँ। ज़ावयार। दादा ना बनो।” अली ने पूरी तरह से इत्तिफ़ाक़ किया।
सूरत-ए-हाल बदल गई थी। अब सिचुयेशन एंजॉय करने की अली की बारी थी। उस ने अपनी वफ़ादारी मेरी बजाय फ़ातिमा की तरफ़ मुंतक़िल कर दी। यही नहीं, वो अपने हाथ बांध कर सीट से टिक कर पूरी तरह एनज्वाए करने के लिए तैयार था। मुझे डर था कि मैं ने एक लफ़्ज़ कहा तो फ़ातिमा की लन-तरानियाँ जारी रहेंगी। मैं ख़ामोश रहा। लेकिन मेरी इस एहतियात का कोई फ़ायदा नहीं था। उस ने बोलना जारी रखा।
“मैं असल में आकर मिलना चाहती थी। और हेलो कहना चाहती थी। लेकिन मुझे जल्दी थी। सुन्दुस मुझे बार-बार काल कर रही थी। मैं ने माल में उस से मिलने का वाअदा किया था। तो मैं आप से बात नहीं कर सकी। आप सुन्दुस को जानते हैं? वो मेरी बेहतरीन दोस्त है। हमारे प्री स्कूल के दिनों से हम साथ हैं। हम बचपन के दोस्त हैं। वो … “
वो सुन्दुस के बारे में बताने लगी और मैं ने शुक्र अदा किया कि उस की तवज्जा अब मुझ पर ना थी। और मेरे लिए इस से बेहतर क्या हो सकता था।
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